Neem Karoli baba – EVENINGTIMESCG https://eveningtimescg.com Mon, 21 Sep 2026 10:48:00 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1.2 https://eveningtimescg.com/wp-content/uploads/2026/05/EVENING-TIMES-1.jpg Neem Karoli baba – EVENINGTIMESCG https://eveningtimescg.com 32 32 नीम करोली बाबा से मिले अमेरिकी डॉक्टर, एक मुलाकात ने बदल दी लैरी ब्रिलियंट की जिंदगी https://eveningtimescg.com/american-doctor-met-neem-karoli-baba-a-meeting-that-changed-larry-brilliants-life/ Mon, 21 Sep 2026 10:48:00 +0000 https://eveningtimescg.com/american-doctor-met-neem-karoli-baba-a-meeting-that-changed-larry-brilliants-life/ इन दिनों नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी महिमा पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा रही है. इस फिल्म के जरिए बाबा के चमत्कारों ने एक बार लोगों के दिलों में जगह बना ली है. नीम करोली बाबा के प्रति ऐसी ही गहरी आस्था सिर्फ आज के लोगों में ही नहीं है, बल्कि दशकों पहले सात समंदर पार से आए एक अमेरिकी डॉक्टर की जिंदगी भी उनके एक इशारे पर हमेशा के लिए बदल गई थी. आइए जानते हैं उस अद्भुत यात्रा के बारे में, जहां उत्तराखंड के कैंची धाम में एक विदेशी डॉक्टर की भेंट नीम करोली बाबा से हुई थी.

जब भटके हुए डॉक्टर की हुई थी बाबा से मुलाकात
70 वह दौर था जब पश्चिमी दुनिया से ढेरों युवा आध्यात्मिक शांति की तलाश में भारत आ रहे थे. उसी समय अमेरिका के रहने वाले डॉ. लैरी ब्रिलियंट (Dr. Larry Brilliant) अपनी जिंदगी के एक ऐसे दौर से गुजर रहे थे जब उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं. इसी तलाश में वे भारत आए और उत्तराखंड में नीम करोली बाबा के आश्रम (कैंची धाम) पहुंचे. मुलाकात के बाद बाबा उन्हें प्यार से 'डॉक्टर अमेरिका' कहकर बुलाने लग गए थे.

वहीं, ट्राइसाइकिल द बुद्धिस्ट रिव्यू को दिए एक इंटरव्यू में लैरी ने बताया था कि आगे चलकर नीम करोली बाबा ने उन्हें दिल्ली जाने और संयुक्त राष्ट्र (UN) के साथ मिलकर देश से चेचक (Smallpox) जैसी खतरनाक बीमारी को खत्म करने के काम में जुटने के लिए भी कहा था.

जिसके बाद आगे चलकर लैरी ब्रिलियंट भारत में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के चेचक (Smallpox) मिटाने वाले प्रोग्राम से जुड़ गए थे. वे जब भी अपनी पुरानी बातें याद करते हैं, तो कैंची धाम जाना और इस बीमारी के लिए काम करना, उन्हें हमेशा याद आता है. लैरी के मुताबिक, उनकी जिंदगी को एक नई दिशा देने के पीछे सिर्फ नीम करोली बाबा का हाथ था.

नीम करोली बाबा से हुई थी लैरी की खास बातचीत
डॉ. लैरी ब्रिलियंट ने इंटरव्यू में बताया था कि, 'जुलाई 1973 में नीम करोली बाबा ने मुझसे कहा था कि तुरंत दिल्ली जाओ और संयुक्त राष्ट्र (UN) के साथ मिलकर काम करो. देश से चेचक की बीमारी को जड़ से मिटाओ.'

उसी इंटरव्यू में लैरी ने बाबा के साथ पैसों को लेकर हुई एक मजेदार बातचीत भी शेयर की थी. उन्होंने बताया कि नीम करोली बाबा ने उनसे पूछा था कि, "डॉ. अमेरिका, तुम्हारे पास कितने पैसे हैं?"

लैरी ने जवाब दिया था कि, "मेरे पास केवल 500 डॉलर हैं." इस पर बाबा ने जवाब दिया कि, "500 डॉलर? तुम झूठ बोल रहे हो, अमेरिका में तुम्हारे पास कुल कितने पैसे हैं?"

लैरी ने तब इमरजेंसी रूम में डॉक्टर के तौर पर काम करने के दिन याद किए और कहा कि, "अमेरिका में भी मेरे पास बस 500 डॉलर ही हैं." लैरी बताते हैं कि इसके बाद वह बातचीत एक कॉमेडी शो में बदल गई. बाबा ने उस बात को हंसी-मजाक में बदल दिया था. वो हंसते बार बार एक ही बोल रहे थे कि, ''500 डॉलर यहां, 500 डॉलर वहां… तुम कोई डॉक्टर नहीं हो!"

लैरी को यह सुनकर अपनी मां की बात याद आ गई, जो अक्सर उन्हें ताना मारती थीं कि तुम पैसे नहीं कमा सकते क्योंकि तुम कोई असली डॉक्टर नहीं हो. लेकिन, बाबा बार-बार यही दोहरा रहे थे कि, "500 डॉलर यहां और 500 डॉलर वहां… तुम डॉक्टर नहीं हो, बल्कि यू-एन-ओ (U.N.O.) डॉक्टर हो."

इसके बाद उनकी बातचीत ने एक ऐसा मोड़ लिया, जिसे लैरी पूरी जिंदगी नहीं भूले. बाबा ने उनसे कहा था कि वह यूनाइटेड नेशन के डॉक्टर बनने जा रहे हैं, जिससे वह दुनिया से चेचक (Smallpox) जैसे खतरनाक बीमारी को मिटाने में मदद करेंगे.

आगे लैरी ने उस समय को याद करते हुए बताया था कि बाबा ने इस खतरनाक बीमारी और उसके भविष्य के बारे में बात करते हुए कहा था, "यह भयानक बीमारी जड़ से खत्म हो जाएगी. क्योंकि भगवान इंसानों को एक ऐसा तोहफा देने जा रहे है, जिससे मानवता इस बड़े दुख और दर्द पर हमेशा के लिए जीत हासिल कर लेगी."

कैंची धाम से लेकर चेचक के खिलाफ जंग तक
कैंची धाम जाने और नीम करोली बाबा से मिलने के बाद लैरी ब्रिलियंट की पूरी जिंदगी ही बदल गई थी. आगे चलकर लैरी भारत में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) के चेचक कार्यक्रम (Smallpox Eradication Programme) में शामिल हुए. जिसके बाद WHO का यह अभियान ग्लोबल पब्लिक हेल्थ के इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक बना था.

साल 1980 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने आधिकारिक तौर पर दुनिया को चेचक से पूरी तरह मुक्त घोषित कर दिया था. इंसानों की इतिहास में यह पहली ऐसी बीमारी थी जिसे जड़ से खत्म किया गया था. लैरी ब्रिलियंट के लिए कैंची धाम की यादें हमेशा उनके सफर से जुड़ी रहीं. वे हमेशा यही मानते थे कि नीम करोली बाबा के एक-एक शब्द ने उन्हें एक नई राह दिखाई और अपनी मेडिकल की पढ़ाई का इस्तेमाल चेचक के खिलाफ जंग लड़ने में करने की प्रेरणा दी थी.

 

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नीम करोली बाबा के चार सरल सूत्र: बिना शर्त प्रेम, निस्वार्थ सेवा, ईश्वर का स्मरण और सत्य का मार्ग https://eveningtimescg.com/neem-karoli-babas-four-simple-principles-unconditional-love-selfless-service-remembrance-of-god-and-the-path-of-truth/ Tue, 15 Sep 2026 11:25:00 +0000 https://eveningtimescg.com/neem-karoli-babas-four-simple-principles-unconditional-love-selfless-service-remembrance-of-god-and-the-path-of-truth/ आज की तेज-तर्रार और भागदौड़ भरी जिंदगी में जब इंसान तनाव, अविश्वास और अकेलेपन से जूझ रहा है, तब मन की शांति और सही राह पाना एक बड़ी चुनौती बन गया है. स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसी दुनिया की बड़ी हस्तियों को दिशा देने वाले नीम करोली बाबा ने जीवन जीने का कोई बहुत जटिल दर्शन नहीं दिया, बल्कि 4 बेहद सरल बातें बताईं. अगर इन 4 सूत्रों को जीवन में उतार लिया जाए, तो किसी भी इंसान की दुनिया बदल सकती है.

1. बिना किसी शर्त के प्रेम (Unconditional Love)
"हर इंसान से प्रेम करो, नफरत का बोझ मत उठाओ."
बाबा नीम करोली के अनुसार, सच्चा प्रेम केवल अपनों तक सीमित नहीं होना चाहिए. इसका अर्थ है हर इंसान के प्रति अपने मन में करुणा और इंसानियत रखना.  किसी से विचार अलग हो सकते हैं या आप उनसे दूरी बना सकते हैं, लेकिन मन में दुश्मनी और कड़वाहट पालकर खुद को ही नुकसान पहुंचता है.  नफरत छोड़ना दूसरों के लिए नहीं, बल्कि खुद के मानसिक सुकून के लिए जरूरी है.

2. निस्वार्थ सेवा ही असली साधना है (Selfless Service)
"सेवा के बिना प्रेम अधूरा है."
सोचना आसान है, लेकिन कर्म में ढालना ही असली परीक्षा है. बाबा का मानना था कि सेवा के लिए करोड़ों रुपये या बड़े साधनों की जरूरत नहीं होती.

किसी भूखे को भोजन कराना,

किसी उदास व्यक्ति की बात सुन लेना,

या किसी बुजुर्ग का हाथ थाम लेना.

यह छोटी-छोटी मदद ही ईश्वर की असली पूजा है.  दूसरों के जीवन को आसान बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है.

3. हर स्थिति में ईश्वर को याद रखना (Remember God)
"चाहे सुख हो या दुख, उस परमात्मा का ध्यान न छूटे."
जीवन में जब सब अच्छा चल रहा होता है, तब हम अहंकार में आ जाते हैं और जब बुरा वक्त आता है, तो निराश होकर बिखर जाते हैं.  बाबा का यह सूत्र हमें याद दिलाता है कि परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन ईश्वर का चिंतन मन को हमेशा स्थिर और शांत रखता है. यह हमें हर स्थिति में विनम्र रहना सिखाता है.

4. सत्य की राह पर चलना (Speak the Truth)
सच बोलना केवल नैतिकता नहीं, मन की शांति की चाबी है."
झूठ बोलने से इंसान के मन में हमेशा पकड़े जाने का डर बना रहता है, जो मानसिक शांति छीन लेता है. सच बोलने से मन हल्का, साफ और निडर रहता है. नीम करोली बाबा कहते हैं कि सत्यवादी व्यक्ति का आचरण ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनता है.

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नीम करोली बाबा के 5 चमत्कार, भक्त आज भी मानते हैं दिव्य शक्तियों का प्रमाण https://eveningtimescg.com/5-miracles-of-neem-karoli-baba-which-devotees-still-consider-to-be-proof-of-divine-powers/ Sun, 13 Sep 2026 09:46:00 +0000 https://eveningtimescg.com/5-miracles-of-neem-karoli-baba-which-devotees-still-consider-to-be-proof-of-divine-powers/  उत्तराखंड की पावन वादियों में स्थित कैंची धाम के गुरु, परम सिद्ध संत नीम करोली बाबा का जीवन अलौकिक सिद्धियों और असीम करुणा का सजीव उदाहरण है. करोड़ों श्रद्धालु उन्हें कलयुग में भगवान हनुमान जी का साक्षात अवतार मानते हैं. बाबा जी का जीवन किसी आडंबर से दूर, अत्यंत सरल और सहज था कि वे बस एक कंबल ओढ़कर बैठते थे, लेकिन उनके दर पर आने वाला कोई भी भक्त कभी खाली हाथ वापस नहीं गया.

उनके जीवनकाल में ऐसे अनगिनत प्रसंग घटे, जहां प्रकृति के नियम भी उनके तपोबल के आगे नतमस्तक हो गए. आइए जानते हैं नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़े 5 ऐसे अलौकिक चमत्कार, जो आज भी श्रद्धालुओं के मन में उनके प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास जगाते हैं.

नदी के पानी का शुद्ध देसी घी में बदलना
कैंची धाम आश्रम के निर्माण के शुरुआती दिनों में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया था. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण अचानक पूरियाँ तलने के लिए देसी घी खत्म हो गया. सेवक घबरा गए और उन्होंने तुरंत बाबा जी को जाकर यह बात बताई. बाबा जी ने शांत भाव से कहा, "घबराओ मत, पास बहती नदी से दो बाल्टी पानी भरकर ले आओ."

सेवक दौड़े-दौड़े गए और नदी से पानी भरकर ले आए. जब बाबा जी के आदेश पर उस पानी को पूरियां तलने वाली गर्म कड़ाही में डाला गया, तो कड़ाही में गिरते ही वह पानी दिव्य सुगंध वाले शुद्ध देसी घी में परिवर्तित हो गया. उस घी से पूरे भंडारे की पूरियाँ तली गईं और अगले दिन बाबा जी के कहने पर बाजार से उतना ही देसी घी खरीदकर वापस नदी में प्रवाहित कर दिया गया.

खारे पानी को गंगाजल की तरह मीठा बनाना
एक बार बाबा जी के आश्रम के समीप स्थित पानी का एकमात्र प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह खारा हो गया. उसका पानी इतना कसैला था कि पीने या भोजन बनाने योग्य नहीं बचा था. स्थानीय लोग और आश्रम के भक्त इस समस्या से काफी चिंतित थे.

जब यह बात बाबा जी के संज्ञान में आई, तो वे स्वयं उस जल स्रोत के पास गए. उन्होंने अत्यंत भाव से उसमें थोड़ा सा चरणामृत मिलाया और भगवान का ध्यान करते हुए मंत्रोच्चार किया. इसके बाद जैसे ही लोगों ने उस पानी को पिया, तो वे आश्चर्यचकित रह गए—वह खारा पानी न केवल पूरी तरह मीठा और सुपाच्य हो चुका था, बल्कि उसमें गंगाजल जैसी दिव्यता और ताजगी आ गई थी.

भक्त की जानलेवा बीमारी को अपने शरीर पर लेना
नीम करोली बाबा अपने भक्तों से मां की तरह प्रेम करते थे. जब भी उनका कोई प्रिय भक्त किसी असाध्य, जानलेवा बीमारी या असहनीय पीड़ा से ग्रस्त होता था, तो बाबा जी की करुणा उमड़ पड़ती थी. वे अपने तपोबल से भक्त के प्रारब्ध और बीमारी के कष्ट को स्वयं अपने शरीर पर धारण कर लेते थे.

ऐसे कई अवसर आए जब भक्त तो रातों-रात पूरी तरह स्वस्थ होकर उठ खड़ा होता था, लेकिन दूसरी ओर बाबा जी स्वयं अपने कंबल के भीतर दर्द से कराहते नजर आते थे. वे भक्त के कष्टों को मुस्कुराते हुए अपने शरीर पर झेल लेते थे ताकि उनके बच्चों को कोई आंच न आए.

कड़ाके की बर्फीली ठंड में नदी में समाधि
उत्तराखंड की हाड़-कांपने वाली सर्दियों में, जहां आम इंसान कई परतों वाले गर्म कपड़ों में भी ठिठुरने लगता है, बाबा जी केवल एक सूती धोती और कंबल में रहते थे. कई बार भीषण बर्फ़ीली रात में बाबा जी ठंडे बर्फीले पानी की नदी में उतर जाते थे और घंटों जल-समाधि में लीन रहते थे.

जब वे जल-समाधि पूरी करके बाहर निकलते, तो उनके शरीर पर ठंड का नामोनिशान तक नहीं होता था. उनका शरीर ऐसे दमकता था मानो वे किसी सामान्य तापमान में बैठकर आए हों. उनकी यह योग-साधना उनके उच्चकोटि के सिद्ध योगी होने का प्रत्यक्ष प्रमाण थी.

भक्त को नया जीवनदान देना
बाबा जी के दरबार में भक्ति की कोई सीमा नहीं थी और न ही उनके आशीर्वाद की. उनके कई भक्तों के जीवन में ऐसे क्षण आए जब गंभीर बीमारियों या दुर्घटनाओं के कारण डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे और डॉक्टरों के अनुसार मृत्यु निश्चित थी.

ऐसे समय में भक्तों के परिजनों ने केवल बाबा जी का ध्यान किया या उनका छुआ हुआ 'आरोग्य प्रसाद' (या चरणामृत) मरीज को दिया. बाबा जी के एक अभयदान और संकल्प से काल को भी पीछे हटना पड़ा. यमराज के द्वार तक पहुंच चुके मरीज चमत्कारिक रूप से पूरी तरह ठीक हो गए और डॉक्टरों के लिए यह बात हमेशा एक अनसुलझा रहस्य बनी रही.

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नीम करोली बाबा के चमत्कारों का सच क्या था? ट्रेन से LSD तक, जानिए कहानियों के पीछे की हकीकत https://eveningtimescg.com/what-was-the-truth-behind-neem-karoli-babas-miracles-from-trains-to-lsd-learn-the-truth-behind-the-stories/ Fri, 11 Sep 2026 08:51:00 +0000 https://eveningtimescg.com/what-was-the-truth-behind-neem-karoli-babas-miracles-from-trains-to-lsd-learn-the-truth-behind-the-stories/ नीम करोली बाबा का नाम आते ही लोगों के मन में सबसे पहले क्या आता है? एक साधारण सा दिखने वाला संत, कंधे पर कंबल और उनसे जुड़ी ऐसी कहानियां, जिन्हें सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. कहीं ट्रेन के रुक जाने की बात होती है, कहीं पानी के घी में बदलने का दावा मिलता है और कहीं उनके सामने एलएसडी का असर खत्म हो जाने की कहानी सुनाई जाती है. लेकिन इन घटनाओं की सच्चाई क्या है? क्या वाकई बाबा के पास कोई असाधारण शक्ति थी या फिर समय के साथ उनके भक्तों के अनुभव चमत्कारों की कहानियों में बदलते चले गए?

दिलचस्प बात यह है कि इन सवालों का जवाब ढूंढते समय सबसे ज्यादा हैरानी बाबा के अपने रवैये से होती है. क्योंकि जिनके नाम पर इतने चमत्कारों की कहानियां सुनाई जाती हैं, वही नीम करोली बाबा खुद चमत्कारों को कोई बड़ी बात मानने से बचते थे.

ट्रेन रोकने से पानी को घी बनाने तक, क्या थे बाबा के चमत्कार?
नीम करोली बाबा से जुड़े कई किस्से आज भी उनके भक्तों के बीच सुनाए जाते हैं. सबसे चर्चित घटनाओं में ट्रेन रुकने वाली कहानी भी शामिल है. कहा जाता है कि एक बार बाबा को ट्रेन में बैठाने के लिए रेलवे कर्मचारी उन्हें अंदर नहीं जाने दे रहे थे. इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी. जब बाबा को ट्रेन में बैठाया गया तो ट्रेन चल पड़ी. ऐसी ही एक कहानी पानी के घी में बदल जाने की भी कही जाती है. वहीं अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक रामदास से जुड़ा एक चर्चित किस्सा एलएसडी को लेकर भी बताया जाता है.

बाबा से जुड़ी ज्यादातर कहानियां आखिर आई कहां से?
नीम करोली बाबा ने खुद अपने जीवन के चमत्कारों की कोई किताब नहीं लिखी थी. उनके बारे में जो सामग्री सामने आती है, उसमें बड़ी भूमिका उन लोगों की है, जो उनसे मिले, उनके साथ रहे या उनके भक्त बने. रामदास की किताब Miracle of Love में बाबा से जुड़े कई अनुभव और प्रसंग मिलते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे किस्सों की है, जिन्हें लोगों ने अपने अनुभव के तौर पर साझा किया.

यही वजह है कि बाबा से जुड़ी कहानियों को समझते समय दो पहलू सामने आते हैं. पहला, वह व्यक्ति जिसने किसी घटना को अपनी आंखों से देखा या महसूस किया और उसे चमत्कार माना. दूसरा, वह व्यक्ति जो उस घटना के पीछे किसी सामान्य वजह की तलाश करता है. मसलन, अगर कोई भक्त कहता है कि बाबा की वजह से उसकी जिंदगी बदल गई, तो उसके लिए वह अनुभव बिल्कुल वास्तविक है. लेकिन इसे वैज्ञानिक रूप से चमत्कार साबित करने के लिए अलग तरह के प्रमाण की जरूरत होगी.

क्या समय के साथ बढ़ती गईं चमत्कारों की कहानियां?
बाबा के निधन के बाद उनके बारे में कहानियां अलग-अलग लोगों तक पहुंचती रहीं. किसी ने अपनी मुलाकात का अनुभव सुनाया, किसी ने किसी घटना को याद किया और किसी ने बाबा के साथ हुई बातचीत को जीवन बदल देने वाला बताया. ऐसे में यह संभावना भी उठती है कि वर्षों तक सुनाई जाती रहीं कहानियों में कुछ बातें जुड़ती या बदलती गई हों.

हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर अनुभव झूठा था. किसी व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक अनुभव बेहद निजी हो सकता है. वह उसे जिस तरह महसूस करता है, उसी तरह बयान करता है. यही कारण है कि नीम करोली बाबा की कहानी में आस्था और तर्क दोनों के लिए जगह बनी हुई है.

लेकिन, बाबा खुद चमत्कारों के बारे में क्या कहते थे? यह शायद इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है.

जिन बाबा के नाम पर इतने चमत्कारों की बातें होती हैं, वह खुद इन दावों से दूरी बनाए रखते थे. भक्त जब उन्हें असाधारण शक्ति वाला संत मानते या उनकी पूजा करने की बात करते, तो बाबा उन्हें अपनी तरफ देखने के बजाय हनुमान जी की भक्ति करने की सलाह देते थे. उनका संदेश सीधा था कि अगर आस्था रखनी है तो भगवान हनुमान में रखो, किसी इंसान को उसका केंद्र मत बनाओ.

बाबा तस्वीरों से भी क्यों बचते थे?
नीम करोली बाबा के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह अपनी तस्वीरें खिंचवाने से बचते थे. उनके लिए बाहरी पहचान से ज्यादा महत्व भक्ति और सेवा का था. उन्होंने अपने बाद किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी घोषित करके अपनी गद्दी नहीं सौंपी. उनके जाने के बाद भी उनके नाम पर कोई ऐसा केंद्रीय धार्मिक ढांचा नहीं बना, जैसा कई दूसरे संतों के साथ देखने को मिलता है. शायद यही वजह है कि बाबा की लोकप्रियता उनके जाने के बाद किसी प्रचार अभियान से नहीं, बल्कि उनके भक्तों की यादों और अनुभवों के जरिए बढ़ती गई.

सितंबर 1973 में क्या हुआ था?
नीम करोली बाबा के जीवन का आखिरी अध्याय सितंबर 1973 में जुड़ा है. बताया जाता है कि वह आगरा में एक हृदय रोग विशेषज्ञ से मिलने के बाद ट्रेन से कैंची लौट रहे थे. रास्ते में उनकी तबीयत बिगड़ गई. इसके बाद वह मथुरा में ट्रेन से उतर गए और अपने साथ मौजूद लोगों से वृंदावन ले जाने के लिए कहा. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. वहां इलाज की कोशिश की गई, लेकिन भक्तों के अनुसार बाबा ने ऑक्सीजन लेने से भी इनकार कर दिया. 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में उनका निधन हो गया. उनके आखिरी समय से जुड़े कई प्रसंग भी भक्तों के बीच सुनाए जाते हैं. इन्हीं में 'जय जगदीश हरे' का जिक्र भी मिलता है. बाबा का शरीर चला गया, लेकिन उनके नाम से जुड़ी कहानियां इसके बाद और तेजी से फैलती चली गईं.

बाबा के जाने के बाद कैंची धाम क्यों बन गया आस्था का बड़ा केंद्र?
आज कैंची धाम सिर्फ एक आश्रम या मंदिर परिसर का नाम नहीं है. यह देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख आध्यात्मिक स्थल बन चुका है. बाबा के जीवन से जुड़े किस्सों के साथ-साथ उन लोगों की कहानियां भी यहां की लोकप्रियता का हिस्सा बनीं, जिन्होंने बाबा या कैंची धाम से किसी तरह का आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस किया. समय के साथ विदेशी यात्रियों और चर्चित हस्तियों के कैंची धाम पहुंचने की बातें भी सामने आती रहीं. इससे बाबा की कहानी भारत से बाहर भी ज्यादा लोगों तक पहुंची.

स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग का कैंची धाम से क्या कनेक्शन है?
नीम करोली बाबा से जुड़ी सबसे चर्चित आधुनिक कहानियों में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग का नाम भी लिया जाता है. यहां एक जरूरी तथ्य समझना जरूरी है. स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा बाबा के निधन के बाद हुई थी. यानी जॉब्स की बाबा से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई थी. लेकिन उनकी भारत यात्रा और आध्यात्मिक खोज को कैंची धाम से जोड़ा जाता है.

बाद में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने भी भारत यात्रा के दौरान कैंची धाम जाने का अनुभव साझा किया था. उन्होंने बताया था कि उनके मेंटर स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत आने और एक ऐसे मंदिर में जाने की सलाह दी थी, जहां वह खुद जा चुके थे. जुकरबर्ग के मुताबिक उस यात्रा ने उन्हें अपने जीवन और फेसबुक को लेकर दिशा समझने में मदद की.

इस कहानी ने नीम करोली बाबा और कैंची धाम को दुनिया भर में चर्चा में ला दिया. हालांकि यहां भी यह साफ समझना जरूरी है कि जुकरबर्ग और जॉब्स के अनुभवों को बाबा के प्रत्यक्ष चमत्कार का प्रमाण नहीं माना जा सकता. ये उनके व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभवों से जुड़े प्रसंग हैं.

तो क्या नीम करोली बाबा के चमत्कार सच थे?
इस सवाल का सबसे ईमानदार जवाब यही है कि सभी चमत्कारों को साबित करने वाला स्वतंत्र और वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. कुछ घटनाएं भक्तों की गवाही और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हैं. उनके लिए वह अनुभव बिल्कुल वास्तविक था. लेकिन किसी अनुभव का वास्तविक महसूस होना और किसी अलौकिक घटना का वैज्ञानिक रूप से सिद्ध होना, दोनों अलग बातें हैं.

ट्रेन रुकने की कहानी हो, पानी के घी में बदलने का दावा हो या किसी व्यक्ति की जिंदगी अचानक बदल जाने का अनुभव- हर घटना को उसी के संदर्भ में देखना जरूरी है. हो सकता है किसी घटना के पीछे कोई सामान्य कारण रहा हो. यह भी संभव है कि किसी व्यक्ति ने उसे अपने आध्यात्मिक विश्वास के नजरिए से देखा हो.

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नीम करौली बाबा की फिल्म ‘हनुमान अंश’ का बॉक्स ऑफिस पर चमत्कार, 32वें दिन कमाई 150 करोड़ पार https://eveningtimescg.com/neem-karoli-babas-film-hanuman-ansh-performs-wonders-at-the-box-office-crossing-rs-150-crore-on-the-32nd-day/ Tue, 08 Sep 2026 07:49:00 +0000 https://eveningtimescg.com/neem-karoli-babas-film-hanuman-ansh-performs-wonders-at-the-box-office-crossing-rs-150-crore-on-the-32nd-day/ नीम करौली बाबा के जीवन पर बनी फिल्म 'हनुमान अंश' पर वाकई में भगवान की कृपा बरस रही है. फिल्म के आंकड़ों ने हर किसी के होश उड़ा दिए हैं. हनुमान अंश रिलीज के एक महीने बाद भी बॉक्स ऑफिस पर चमत्कारी कमाई कर रही है. इस फिल्म ने बड़ी स्टारकास्ट वाली फिल्म 'टॉक्सिक' और 'आवारापन 2' को धूल चटा दी है.

क्या बोले फिल्म के कंपोजर?
'हनुमान अंश' की चमत्कारी सक्सेस पर अब फिल्म के म्यूजिक कंपोजर साधू सुशील तिवारी और रितेश पाठक ने रिएक्ट किया है. हिंदुस्तान संग बातचीत में फिल्म की ताबड़तोड़ कमाई पर फिल्म के कंपोजर ने कहा- जिस तरह का कलेक्शन चल रहा है, तो इसे कृपा ही कहेंगे.

'मुझे जितनी बार भी लोगों ने पूछा और कहा कि ये चमत्कार है, तो मैंने यही कहा कि यह आशीर्वाद है…कृपा है. हम हिंदुस्तान के लोग हैं. हमें आशीर्वाद ही लगता है कि माता-पिता का, गुरुओं का. हम बजरंगबली के भक्त हैं, बजरंगबली का, राम जी का आशीर्वाद मिला है. इसे बाबा नीम करौली जी का, सीता-राम जी का आशीर्वाद तो मिला ही हुआ है…वरना इतनी छोटी फिल्म को प्यार जो लोगों का मिल रहा है, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है.

उन्होंने आगे कहा- यह ऐतिहासिक घटना है. मुझे लगता है कि लोग हनुमान अंश फिल्म पर विचार भी करेंगे कि एक फिल्म ने ऐसे कैसे कमाई कर ली.

150 करोड़ पार फिल्म की कमाई
'हनुमान अंश' फिल्म की बात करें तो बिना किसी बड़ी स्टारकास्ट और बजट के फिल्म धुआंधार कमाई कर रही है. 32वें दिन फिल्म का भारत में अब तक का कुल ग्रॉस कलेक्शन 156.20 करोड़ रुपये हो गया है, जबकि फिल्म का कुल नेट कलेक्शन 132.13 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है. फिल्म की कमाई अभी भी जारी है. देखते हैं कि यह आंकड़े कहां जाकर रुकते हैं.

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नीम करोली बाबा और उनका कंबल: आस्था, वैराग्य और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक https://eveningtimescg.com/neem-karoli-baba-and-his-blanket-a-symbol-of-faith-detachment-and-spiritual-power/ Sat, 27 Jun 2026 07:53:00 +0000 https://eveningtimescg.com/neem-karoli-baba-and-his-blanket-a-symbol-of-faith-detachment-and-spiritual-power/  भारत एक ऐसा देश है जहां लोग आस्था, संस्कृति, धर्म और रहस्यमयी शक्तियों पर गहरा विश्वास रखते हैं. यहां के संत-महात्माओं में एक बहुत प्रसिद्ध नाम है नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्यार से महाराज जी कहते हैं. उनकी ख्याति सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि विदेशों तक पहुंची. मशहूर बिजनेसमैन स्टीव जॉब्स और अमेरिकी आध्यात्मिक गुरु राम दास भी उनसे प्रभावित थे.

नीम करोली बाबा की एक खास पहचान उनकी सादी ऊनी चादर थी. कहा जाता है कि वे हर मौसम में, चाहे कड़ाके की ठंड हो या तेज गर्मी, हमेशा उसी चादर में रहते थे. यह बात कई लोगों को हैरान करती थी और वे सोचते थे कि इसके पीछे क्या रहस्य है.

नीम करोली बाबा हमेशा कंबल क्यों ओढ़ते थे?
हालांकि, इस बात का कोई पुख्ता सबूत तो नहीं है. लेकिन, बाबा के भक्त दादा मुखर्जी कहते हैं कि कि वह कंबल जैसे बाबा का ही एक हिस्सा हो. बाबा जहां भी जाते, वह कंबल हमेशा उनके साथ रहता था. कई बार उस कंबल से नवजात बच्चे जैसी खुशबू आती थी. लोगों का यह भी मानना था कि वह कंबल कभी बहुत हल्का तो कभी भारी महसूस होता था, जैसे उसमें अपनी कोई शक्ति या चेतना हो.

उन्होंने कहा कि बाबा के पास दो कंबल थे, एक जो सबको दिखता था, जो उनके शरीर को ढकता था. दूसरा जो दिखाई नहीं देता था, जो उनकी बड़ी आध्यात्मिक शक्ति और उपलब्धियों को छुपाए रखता था.

वैराग्य का प्रतीक
दादा मुखर्जी ने बताया कि बाबा का कंबल सिर्फ पहनने की चीज नहीं था, बल्कि वह त्याग (वैराग्य) और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक था. महाराज जी हमेशा वैराग्य की बात करते थे कहा जाता है कि एक बार एक भक्त उनके कंबल को ठीक करने लगा, तो बाबा ने कहा, 'इसे रहने दो, जैसा है वैसा ही रहने दो. किसी को भी किसी चीज से बंधा नहीं होना चाहिए.'

भक्तों का मानना है कि यह हिंदू धर्म के एक मुख्य सिद्धांत वैराग्य को दर्शाता है. यह कंबल इस बात का प्रतीक था कि हमारा शरीर अस्थायी है और आत्मा ही सच्ची और हमेशा रहने वाली है. बाबा अपने आराम और बाहरी रूप की परवाह नहीं करते थे, ताकि लोग अंदर की चेतना पर ध्यान दें, न कि शरीर पर.

भक्तों की रक्षा के लिए
एक और वजह यह मानी जाती है कि बाबा कंबल अपने भक्तों की रक्षा के लिए ओढ़ते थे. कहा जाता है कि वे अपने भक्तों की बीमारी और कर्मों का बोझ खुद पर ले लेते थे. दादा मुखर्जी के अनुसार, 'वह कंबल उन सभी दुखों और पीड़ा को छुपा लेता था, जो बाबा दूसरों से अपने ऊपर ले लेते थे. वह सिर्फ शरीर को नहीं ढकता था, बल्कि उसमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति भी थी, जिससे वे अपने भक्तों का दुख दूर कर सकते थे.'

कई लोगों का यह भी मानना है कि बाबा कभी-कभी बीमार लोगों पर वह कंबल रख देते थे, जिससे उन्हें राहत मिलती थी. एक भक्त ने बताया कि एक बहुत ठंडी रात में वह कंबल आसपास के लोगों को गर्माहट और सुकून देता हुआ महसूस हुआ.

जीवन में शांति का प्रतीक
महाराज जी के कंबल का रंग भी खास माना जाता है. उनका कंबल अक्सर नीले या हल्के रंग का होता था. नीला रंग शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. इसलिए लोग मानते हैं कि वह कंबल उन्हें अंदर से शांत और संतुलित बनाए रखता था. बाबा कहते थे कि इंसान सिर्फ शरीर नहीं है, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक शक्ति का रूप है. उनका कंबल यह भी दिखाता था कि उन्हें गर्मी-ठंड जैसी शारीरिक चीजों से कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि उनका ध्यान अपने आध्यात्मिक मार्ग पर था.

अपनी शक्तियों को छुपाने का माध्यम
नीम करोली बाबा बहुत साधारण जीवन जीते थे, लेकिन माना जाता है कि उनके पास कई चमत्कारी शक्तियां (सिद्धियां) थीं, जिनके बारे में वह ज्यादा बात नहीं करते थे. कहा जाता है कि उनका कंबल उन शक्तियों को छुपाने का एक तरीका था, ताकि लोग उन्हें लेकर ज्यादा आकर्षित न हों. दादा मुखर्जी के अनुसार, 'शायद वे ऐसा अपने बचाव के लिए या लोगों की भीड़ से बचने के लिए करते थे.'

बाबा का कंबल और आस्था
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक रिचर्ड एलपर्ट, जो बाद में राम दास बने, ने 1979 में मिरेकल ऑफ लव नाम की किताब लिखी थी. इसमें उन्होंने बाबा के चमत्कारों का जिक्र किया और एक घटना ‘बुलेटप्रूफ कंबल’ के बारे में भी बताया. क्योंकि बाबा हमेशा कंबल ओढ़ते थे, इसलिए आज भी जब लोग कैंची धाम आश्रम जाते हैं, तो फूल-माला की जगह कंबल चढ़ाते हैं.

आज भी क्यों खास है यह कंबल?
1973 में बाबा के निधन के कई साल बाद भी उनकी कंबल ओढ़े तस्वीरें आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं. इन तस्वीरों में वे मुस्कुराते हुए नजर आते हैं. कुछ लोगों के लिए यह कंबल प्यार और सुरक्षा का प्रतीक है, तो कुछ के लिए यह सादगी, त्याग और आत्मिक शांति का संदेश देता है. हालांकि, इतिहास में इसका कोई पक्का कारण नहीं मिलता कि बाबा हर मौसम में कंबल क्यों पहनते थे, लेकिन भक्त मानते हैं कि इसका महत्व सिर्फ उपयोग तक सीमित नहीं था.

दादा मुखर्जी ने कहा, 'उस कंबल के नीचे बाबा दुनिया का सारा दुख अपने ऊपर ले लेते थे. यह हमें कर्म और दुखों से बचाने का उनका तरीका था. यह कंबल हमें याद दिलाता है कि जो कुछ हम बाहर ढूंढते हैं, वह सब हमारे अंदर ही है. असली महत्व बाहरी चीजों का नहीं, बल्कि अंदर की यात्रा का है.'

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