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परिणीति चोपड़ा का OTT डेब्यू फीका! ‘शक: ट्रस्ट नो वन’ में ट्विस्ट तो बहुत, रोमांच गायब

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परिणीति चोपड़ा का ओटीटी डेब्यू हो गया है. उनकी सीरीज शक: ट्रस्ट नो वन आज नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई. सीरीज की कहानी ऐसी है, जिसे हम पहले सुन भी चुके हैं. यह अमेरिका के फिलाडेल्फिया की बच्ची डेलिमार वेरा (Delimar Vera) की जिंदगी से प्रेरित है.

डेलिमार वेरा फिलाडेल्फिया की वही छोटी बच्ची जो 10 दिन की उम्र में गायब हो गई थी और वर्षों बाद अपनी मां से मिली. कहानी भावुक है, अविश्वसनीय है और इतनी सिनेमाई है कि इसमें बहुत ज्यादा सजावट की जरूरत ही नहीं है. लेकिन परिणीति की सीधे-सादे भावनात्मक आधार वाली सीरीज को तकरीबन 40-40 मिनट के सात एपिसोड में खींचा गया है और यहीं से परेशानी शुरू होती है.

यह कहानी दो घंटे की एक कसी हुई फिल्म की हकदार थी. इसके बजाय मेकर्स इसे थ्रिलर, इमोशनल फैमिली ड्रामा, रिश्तों, रहस्य और कई जगह लगभग सुपरनैचुरल कहानी बनाने की कोशिश करते हैं. इसमें किडनैपिंग है, गैरकानूनी सरोगेसी है, बेवफाई है, सास-बहू का ड्रामा है, तंत्र-मंत्र है, हैलुसिनेशन हैं और इतने सारे राज हैं कि हर किरदार कुछ न कुछ छिपाता नजर आता है.

कभी-कभी कहानी को सब कुछ देने की जरूरत नहीं होती. ‘शक’ के केंद्र में एक मां है, जो अपनी उस बेटी को तलाश रही है जिसे जन्म के वक्त अगवा कर लिया गया था. उसे यकीन है कि उसकी बच्ची जिंदा है और एक दिन उसकी जिंदगी में वापस आएगी. इतना भर अपने आप में एक मजबूत कहानी है लेकिन शो लगातार इसमें नई परतें जोड़ता जाता है, मानो मेकर्स को डर हो कि सिर्फ मां-बेटी की यह कहानी दर्शकों को बांधे नहीं रख पाएगी.

नतीजा यह होता है कि थ्रिलर लगातार ट्विस्ट तो देता रहता है, लेकिन वह सबसे जरूरी चीज भूल जाता है जिसकी एक अच्छे थ्रिलर को जरूरत होती है, जिज्ञासा.

दूसरे या तीसरे एपिसोड तक आपको काफी हद तक अंदाजा हो जाता है कि कहानी किस दिशा में जाने वाली है. इसके बाद आप यह जानने के लिए उत्सुक नहीं रहते कि हुआ क्या है. आप बस यह इंतजार करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ और कैसे हुआ और जब दर्शक मोटे तौर पर रहस्य सुलझा चुका हो, लेकिन किरदार कई एपिसोड तक उसी रहस्य के आसपास घूमते रहें, तो सस्पेंस रोमांच की जगह धैर्य की परीक्षा लेने लगता है.

‘शक’ यानी संदेह शायद यही इस शो का सबसे बड़ा मिस्ड प्वॉइन्ट है. शो चाहता है कि दर्शक हर किसी पर शक करे लेकिन खुद मुख्य किरदार को शायद ही कभी किसी पर वास्तव में शक करने की ठोस वजह दी जाती है और यह पूरी तरह उसकी गलती नहीं, बल्कि कमजोर लेखन का नतीजा है.

फिर आते हैं राज. यहां लगभग हर किसी के पास कोई न कोई राज है. कागज पर देखें तो ये सभी मसाले एक बेहद दिलचस्प और पल-पल करवट लेने वाली कहानी के लिए पर्याप्त हैं लेकिन ‘शक’ एक साथ मां की भावनात्मक कहानी भी बनना चाहता है और हर किरदार के इर्द-गिर्द घूमता ट्विस्ट से भरा थ्रिलर भी. इसी कोशिश के बीच कहानी कहीं अपना रास्ता खो देती है.

लेखन कई जगह सुविधानुसार कहानी को आगे बढ़ाता नजर आता है. एक पुलिस अफसर है, लेकिन भावनात्मक एंगल बनाने के लिए उसे बीमार कर दिया जाता है और फिर वह टैरो कार्ड पढ़ने लगता है. टैरो कार्ड के जरिए वह न सिर्फ मुख्य किरदार को उम्मीद देता है, बल्कि कहानी को अगले खुलासे की तरफ भी धकेलता है. यह सब किरदार के स्वभाव से स्वाभाविक रूप से निकलता हुआ कम और ऐसा ज्यादा लगता है जैसे लेखकों को कहानी पूरी करने के लिए एक और मोहरा चाहिए था.

यही बात कुछ ज्यादा नाटकीय दृश्यों पर भी लागू होती है, खासकर तेज लाल रोशनी और हैलुसिनेशन वाले हिस्सों पर. ये दृश्य माहौल के भीतर से थ्रिल पैदा करने के बजाय सीधे ऐलान करते हैं कि ‘अब थ्रिलर शुरू हो गया है.’ कई जगह इनका जरूरत से ज्यादा नाटकीय होना अनजाने में हास्यास्पद भी लगने लगता है.

दुर्भाग्य से कहानी का भावनात्मक पक्ष भी उतनी मजबूती से असर नहीं छोड़ पाता, जितना उसे छोड़ना चाहिए था. मां का दर्द आपको उस गहराई से महसूस नहीं होता, जिसकी इस कहानी को जरूरत है. उसकी बेटी के खोने का दुख आपको भीतर तक नहीं तोड़ता. यहां तक कि जब वह दूसरे लोगों के बच्चों में अपनी बेटी को तलाशने की बेचैनी दिखाती है, तब भी वे दृश्य दिल तोड़ने के बजाय कई बार बनावटी और परेशान करने वाले लगते हैं.

परिणीति चोपड़ा के हिस्से कुछ अच्छे पल जरूर आते हैं. खासकर कमजोर और भावुक दृश्यों में वह अपने किरदार के गुस्से के नीचे छिपे दुख की झलक दिखाने में सफल रहती हैं. लेकिन ज्यादातर समय वह अपने किरदार को इतने तीखे और लगभग हमेशा गुस्से से भरे हावभाव के साथ निभाती हैं कि दर्द और बदले की भावना के बीच का फर्क धुंधला पड़ जाता है.

ताहिर राज भसीन ग्रे शेड वाले किरदार में अपने चरित्र को पर्याप्त रूप से डरावना बनाए रखते हैं. सोनी राजदान यहां सरप्राइज पैकेज हैं. उनके मासूम चेहरे और किरदार के कामों के बीच का विरोधाभास कई जगह वाकई बेचैन करने वाला असर पैदा करता है. हरलीन सेठी, सुमीत व्यास और अनुप सोनी को भी मजबूत किरदार मिले हैं और वे अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करते हैं. वहीं जेनिफर विंगेट को शायद सबसे दिलचस्प मौका मिला है अपनी रेंज दिखाने का. ‘बेहद’ के बाद एक बार फिर उन्हें किरदार के अलग-अलग रंग तलाशने का मौका मिलता है और वह साबित करती हैं कि असमान लेखन के बावजूद दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचने की उनमें पूरी क्षमता है.

शिमला भी खूबसूरत नजर आता है. लेकिन बस खूबसूरत। कहानी में ये लोकेशन कभी किरदार नहीं बन पाती. इतने खास माहौल वाले शहर में सेट थ्रिलर में पहाड़, धुंध और अकेलापन कहानी के तनाव को कई गुना बढ़ा सकते थे. लेकिन यहां वे ज्यादातर खूबसूरत बैकड्रॉप बनकर रह जाते हैं.

सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा और रेंसिल डी'सिल्वा दोनों पहले मजबूत काम से जुड़े रहे हैं, लेकिन यहां कहानी को ‘थ्रिलर’ बनाने की कोशिश खुद कहानी पर हावी होती नजर आती है. मेकर्स आपको एक ऐसा मुकम्मल ड्रामा देना चाहते हैं, जिसकी मांग असल कहानी ने कभी की ही नहीं थी. वे इसमें रहस्य भी चाहते हैं, भावनाएं भी, रोमांस भी, पारिवारिक राज भी, सुपरनैचुरल रंग भी और एक चमत्कार भी और ‘शक’ को सब कुछ बनाने की कोशिश में वे उसे असल में बहुत कम बना देते हैं.

सात एपिसोड देखने के बाद सबसे बड़ा रहस्य यह नहीं रह जाता कि बेटी को किसने अगवा किया था. असली सवाल यह रह जाता है कि आखिर इस कहानी को सात एपिसोड की जरूरत थी ही क्यों?


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