बहुत वर्षों पहले एक सज्जन ने विकास प्राधिकरण द्वारा एक भूखण्ड प्राप्त किया था, बैंक से ऋण लेकर मकान बनवाने का विचार किया। वह सज्जन कर्म प्रधान थे, कर्म को सर्वोपरि मानने के कारण ईश्वर पर उनकी आस्था नहीं थी, इसलिए उन्होंने वास्तु के सिद्धान्तों की अवहेलना कर येन-केन-प्रकारेण दो-तीन कमरों का छोटा-सा मकान भूखण्ड पर बना लिया, वह वास्तु के नियमों के सर्वथा विपरीत था। वास्तु विजिट के दौरान उस भूखण्ड पर निम्नलिखित वास्तुदोष पाए गए।
- उस भवन में उत्तर व पूर्व दिशाएँ बन्द कर दी गईं और दक्षिण-पश्चिम में खुला स्थान अधिक छोड़ दिया गया था।
- उत्तर-पूर्व में रसोई घर की स्थिति उपयुक्त नहीं थी।
- पूर्व में सीढ़ियाँ तथा दक्षिण-पूर्व यानि आग्नेय कोण पर शौचालय व स्नानघर उचित स्थान पर नहीं थे।
- सीढ़ियों के ऊपर ढकने के लिये बनाई गई अटारी के कारण पूर्व की ओर भवन की ऊंचाई पश्चिम व दक्षिण की अपेक्षा अधिक हो गई जो वास्तु के विपरीत थी।
- भूखण्ड के दक्षिण में उत्तर की अपेक्षा अत्यधिक स्थान खाली छोड़ कर निर्माण कराया गया था।
इसी प्रकार के वास्तुदोष तथा मकान मालिक की व्यक्तिगत ग्रहदशा के कारण उक्त भूखण्ड क्रय करने के पश्चात् एक वर्ष भी नहीं बीता था कि बीमारी के कारण मकान मालिक की मृत्यु हो गई। कुछ वर्षों बाद उस परिवार के एक सदस्य ने भवन का वास्तु दिखवाया, भवन में निम्नलिखित वास्तु सुधार कराया गया। दक्षिणी भाग में खाली पड़ी अतिरिक्त भूमि को बेचकर उस भूखण्ड को छोटा कराया गया जिससे दक्षिण की ओर खाली स्थान उत्तर की अपेक्षा कम हो गया, जिससे उस जगह का वास्तुदोष समाप्त होने के कारण परिवार के सदस्यों को धन भी प्राप्त हुआ।
सीढ़ियाँ व शौचालय पूर्व व दक्षिण पूर्व में वर्तमान स्थान से हटाकर दक्षिण-पश्चिम भाग में बनाए गए, जो उस भवन के वास्तु के अनुसार उचित थे।
रसोईघर को दक्षिण-पूर्व यानि अग्नि कोण पर परिवर्तन किया गया।
सम्बन्धित व्यक्तियों ने उक्त सलाह मान ली और इसके अनुसार ही परिवर्तन तुरन्त किया गया। वास्तु सम्बन्धी नियमों को समझकर आवश्यक सुधार कराने पर उस परिवार की सारी कठिनाइयाँ दूर होती चली गई और सुगमता से मकान का निर्माण पूरा हो सका। आज वह परिवार अपने घर में सुख से निवास कर रहा है।




