

डॉ. सुधीर सक्सेना
अंतत: धुयें, धमाकों और तीखे नारों के अराजक घटाटोप के बीच पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने जेनरेशन जेड के आक्रोश के सामने घुटने टेकते हुये ‘राजीनामा’ (त्यागपत्र) दे दिया। बाजी हाथ से फिसलने के आखिरी हताश क्षणों में उन्होंने सेना प्रमुख अशोक राज सिगदेल से ‘निरापद बहिर्गमन’ की याचना की थी और फिर देश छोड़ दिया। राजधानी काठमांडू अभी भी अशांति, आंदोलन आगजनी और अफरातफरी की चपेट में है और सबकी नज़र सेना और आंदोलनकारी युवकों के नेता सुदन गुरूंग पर है। नेपाल के घटनाक्रम को श्रीलंका और बांग्लादेश में तख्तापलट की श्रंखला की कड़ी माना जा रहा है। कहना कठिन है कि चौराहे पर खड़े नेपाल में घटनाक्रम क्या मोड़ लेगा?
सागरमाथा के देश नेपाल में मौजूदा हफ्ते के प्रारंभिक तीनों दिन अशांति, आंदोलन, रक्तपात और आगजनी में बीते। पुलिस की गोलियों से कमसकम 19 लोग मारे गये और तकरीबन चार सौ लोग घायल हुए। जेनरेशन ज़ेड के उग्र आंदोलन की शुरूआत सोशल मीडिया की 26 साइट्स पर पाबंदी से शुरू हुई। अर्सा पहले सरकार को टिकटाक पर पाबंदी का फर्मान वापस लेना पड़ा था, लेकिन उससे सबक न लेकर ओली-सरकार ने फेसबुक, वाट्सएप और गूगल बाबा की गोद में पली नयी पीढ़ी में मूड को न भांपते हुये इन साइटों पर प्रतिबंध लगा दिया। फलत: युवक सड़कों पर आ गये। कर्फ्यू बेअसर रहा। देखते ही देखते छात्रों की मांगों में भ्रष्टाचार का मुद्दा आ जुड़ा। कर्फ्यू, दमन, आंसू गैस और गोली चालन ने आग में घी का काम किया। युवकों ने सड़कों पर ‘हाम्रो रगत फिर्ता दे’ (हमारा खून वापस करो) के नारे लगाये। चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि पीएम ओली का चेहरा खलनायक में बदल गया। राजधानी की सड़कों पर पोस्टर लहराये गये, जिन पर ओली के बदनुमा चेहरे के नीचे लिखा था : ‘म हत्यारा हो। नाति पुस्तालाई गोलि हानि हत्या हर्न निर्देशन दिने हत्यारा सरकार’ (मैं हत्यारा हूँ। हत्यारी सरकार, जो पौत्र-पीढ़ी पर गोलियां दागने का हुक्म देती है)।
उग्र छात्रों ने जो नारे लगाये उनमें एक नारा यह भी था : ‘केपी चोर, देश छोड़’। छात्रों ने आंदोलन के जरिये 72 घंटों के भीतर ही ओली, जिन्होंने गत वर्ष अगस्त में चौथी बार गद्दी संभाली थी, बदहवासी में सत्ता छोड़ने को बाध्य कर दिया। इस्तीफे के पूर्व नेपाली कांग्रेस के उनके सहयोगी मंत्रियों ने ताबड़तोड़ इस्तीफे दिये। पीएम की बुधवार की शाम सर्वदलीय बैठक बुलाने की पेशकश काम नहीं आई। उत्तेजित युवक आरपार की लड़ाई पर आमादा थे। कम से कम सात मंत्रियों के घरों पर हमले और आगजनी हुई जल आपूर्ति मंत्री प्रदीप यादव जैसों ने जन-आक्रोश को भांपकर इस्तीफा दिया और आंदोलनकारी युवकों को भाइयों-बहनों संबोधित कर उन्हें अव्वल साथी और ऊर्जा स्रोत करार दिया। छात्रों ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल और ओली के घरों को भी निशाना बनाया। नेपाल राष्ट्र बैंक के गवर्नर बिस्वो पौडेल के घर पर भी गुम्मे फेंके गये। नेपाली कांग्रेस के सचिव गगन थापा ने ओली से गोली कांड की जिम्मेदारी लेने और इस्तीफा देने का आग्रह किया, लेकिन ओली सत्ता के मद में बड़ी ‘चूक’ कर चुके थे। नेपाली सेना के मुखिया सिगदेल ने भी ‘सेफ पैसेज’ के आग्रह पर ओली को पहले इस्तीफा देने का परामर्श दिया। ओली के समक्ष इसके बाद पलायन के सिवाय कोई चारा न था।
नेपाल छोटा राष्ट्र है, लेकिन इस छोटे राष्ट्र के तख्तापलट के निहितार्थ बड़े हैं। जेनरेशन ज़ेड वह पीढ़ी है, जो सन 1997 से 2012 के बीच जनमी है। यह पीढ़ी बेहतर जीवन रोजगार और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था चाहती है। अब सबकी निगाहें सेना और छात्रों के नेता सुदन गुरूंग पर हैं। नेपाल की राजधानी अराजकता की चपेट में है। आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता कवि लामिछाने को नखु जेल से छुड़ा लिया है। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देऊबा और उनकी पत्नी विदेश मंत्री आरजू राणा आहत अवस्था में देखे गये। परिवहन उद्यमियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान कर दिया है। ओली का चीन की ओर झुकाव जगजाहिर था। उनका पतन राजनय और क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से मायने रखता है। युवा पीढ़ी का गुस्सा उफान पर है। राजशाही समर्थक शक्तियां भी सिर उठा सकती हैं। नेपाल में चीन और अमेरिका की भी रूचि है। नेपाल में लगभग हर दस बरस में उथल-पुथल का इतिहास है। यह भी तय है कि ‘ठोंकशाही’ को कोई भी जागृत समाज ज्यादा सहन नहीं करता। नेपाल का घटनाक्रम इसकी नजीर है।




