

प्रेमचंद जयंती पर लिंगियाडीह में प्रेमचंद के साहित्य में बच्चों की भूमिका विषय पर परिचर्चा का आयोजन
#प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम बेहद रोचक रहा#.
बिलासपुर। महान साहित्यकार प्रेमचंद की 145 वीं जयंती पर स्वामी आत्मानंद स्कूल सेजस लिंगियाडीह में प्रेमचंद के साहित्य में बच्चों की भूमिका विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। प्रेमचंद की कहानियों पर छात्र छात्राओं से बात करते हुए विशिष्ट अतिथि प्रलेस के राज्य अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार नथमल शर्मा ने कहा कि साहित्य अपने समय को तो रचता ही है वह समय के आगे भी देखता है। और जो साहित्यकार समय के आगे को देखने की दृष्टि रखता है वही कालजयी होता है। जब प्रेमचंद की उस कहानी ठाकुर का कुआं या बूढ़ी काकी या पंच परमेश्वर आदि को पढ़ते हैं तो लगता है कि कि हमारे गांव की बात हो रही है. हमारे आसपास की बात हो रही है।उस बूढ़ी काकी को आप थोड़ा ध्यान से पढ़िए तो लगेगा कि हमारे आसपास ही है। इस कॉर्पोरेट समय ने तो और ज्यादा काकियों को क्या माता-पिता को भी उसी तरह से कर दिया है बड़ा निर्मम समय है। और ऐसे निर्मम समय में कथा जगत, साहित्य जगत थोड़ी छांव देता है।थोड़ी सी रोशनी देता है। वह एक नरम जमीन देता है जहां हम अपननी उन कोमल भावनाओं को उगा सकते हैं। यह साहित्य की ताकत होती है। जब तक हमारे समाज में हमारे परिवार में हमारे घरों में वह बात नहीं आएगी तब तक हम उसे कैसे स्वीकार करेंगे । प्रेमचंद की कहानियों पर बात करने का अवसर मिलता है यह बड़ी बात और यह बड़ी उपलब्धि है इसे अपनी जिंदगी में बनाए रखिए। समाज में जो कुछ है उसे आप देख रहे हैं ठीक है पर उसे उसे देखने की दृष्टि साहित्य देता है। आपको जिंदगी में स्कूल के दिन याद रहेंगे यह डिसिप्लिन याद रहेगा और प्रेमचंद याद रहेंगे । प्रेमचंद को जीवन भर याद रखिए। आप मान के चलिए आप बेहतर मनुष्य रहेंगे।
इस अवसर पर प्रलेस के जिला सचिव अशोक शिरोडे ने कहा कि दो चीजें बहुत स्पष्ट है जो पढ़ेगा वही बढ़ेगा और जो लिखेगा वही सीखेगा। अनेक साहित्यकार हुए हैं। पर प्रेमचंद ऐसे है कि जिनसे आप धीरे-धीरे मानवीय मूल्य आत्मसात करते जाते है। प्रेमचंद के साहित्य में बच्चों की भूमिका पर भी बहुत लिखा है। प्रेमचंद की कहानियों में बच्चों को संवेदनशील और मानवीय गुणों से परिपूर्ण दर्शाया गया है।
स्वामी आत्मानंद सेजस के प्राचार्य एम के मिश्रा ने परिचर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि कहा है इस आयोजन का उद्देश्य यही है कि बच्चों के मन में जो धारणाएं हैं जो भावनाएं हैं उन भावनाओं को एक आकार दिया जाए। मोबाइल के युग में यह सब चीज बहुत कम होते जा रही है। लोग बहुत जल्दी इरिटेट करते हैं। आज के इस आयोजन का उद्देश्य यही है कि साहित्य से जुड़ कर आप और संवेदनशील बने। दूसरों का दुःख समझ सके। वरिष्ठ कवि रफ़ीक खान ने कहा कि प्रेमचंद का कथा साहित्य हमें बेहतर मनुष्य बनाता है. हम समाज को देखने का नज़रिया उससे प्राप्त करते है और सबसे बड़ी बात कि इससे हम संवेदनशील बनते है. परपीड़ा को समझते है। स्वाभाविक रुप से हममें एक दया भाव तो विकसित होता ही है संघर्ष की शक्ति भी मिलती है. श्री खान ने इस आयोजन की सराहना करते हुए इसके लिए प्राचार्य एवं समस्त शाला परिवार के प्रति कृतज्ञता प्रगट की। प्रसिद्ध रंगकर्मी सचिन शर्मा ने कहा है कि चूंकि वह नाटक के क्षेत्र से जुड़े हैं तो बात की शुरुआत कुछ इसी तरह की जाए। अगर आप अभिनय से जुड़ना चाहते हैं तो दो साहित्यकारों का नाम लेता हूं। एक तो आप प्रेमचंद की कहानियां पढ़िए, प्रेमचंद के उपन्यास पढ़िए। दूसरा हरिशंकर परसाई को पढ़िए। यह दो ऐसे हिंदी के लेखक हुए हैं,जिनकी रचनाओं में आपको पूरा मनोविज्ञान मिलेगा । और मनोविज्ञान को समझे बिना आप अच्छे अभिनेता नहीं बन सकते।आप किसी पात्र का अगर अभिनय करना चाहते हैं तो वह पात्र कैसा सोचता होगा क्या उसके अंदर वह फीलिंग आएगी। तभी तो आप उसका अभिनय कर पाएंगे और प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्होंने मनोविज्ञान को सहज और सरल रूप से चित्रित किया है। उनकी कहानियों में आपको करुणा लोक अहंकार ,लालच मतलब ऐसी कोई मनोभाव ऐसा नहीं है जो उनकी कहानियों में न मिले। उनकी भाषा ऐसी रही है कि कोई भी सामान्य ज्ञान का व्यक्ति भी उनकी कहानियों को पढ़ सकता है यह सहजता और सरलता ही उनको महान बनाती है । प्रेमचंद ने 13 साल की उम्र में वह लगभग अपने समय के सारे बड़े कथाकार उपन्यासकारों को पढ़ चुके थे । और 15 साल की उम्र से तो उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था।
… तो ये संकल्प लेकर जाएं आज
श्री शर्मा ने कहा कि जब हम प्रेमचंद जयंती को मनाने बैठे हैं दोस्तों तो आज कोई भी एक संकल्प लेकर यहां से जाएं कि हम हफ्ते में 2 दिन तक स्क्रोल नहीं करेंगे। हम हफ्ते में एक दिन पूरा दिन मोबाइल को हाथ नहीं लगाएंगे । हम हफ्ते में काम से कम एक दिन कोई एक कहानी पढ़ेंगे । हफ्ते में एक दिन अपनी दादी या नानी या मामी या चाचा के साथ बात करेंगे, उनकी बातें सुनेंगे । सब कुछ अगर हम ऐसा करने लग जाए तो हम बेहतर मनुष्य बनने की ऒर बढ़ेंगे। श्री शर्मा ने कहा कि हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते हैं। कॉर्पोरेट में भेजना चाहते हैं। पर क्या अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करते हैं। वह अच्छा इंसान नहीं बनता है तो उसका अच्छा डॉक्टर बनना कोई मायने नहीं रखता. और साहित्य हमें यही संस्कार देता है. इसे याद रखिये. और हाँ आप सबमें सम्भावनाएं हैं. जो कुछ महसूस करते हैं अवश्य लिखिए।





