

वहां जा रहे थे वे सब कि आते हैं जल्दी ही लौट कर। कोई तीन दिन में आने वाला था तो कोई तीन महीने बाद। पर आना सबको था। लौट कर आने के लिए निकले वे सब लोग अब कभी नहीं लौटेंगे। ऐसा कभी नहीं लौटना कितना दुःखदायी होता है यह स्वयं को उन दो सौ बयालिस लोगों के परिवार के दुःख में शामिल करके सोचा जा सकता है। कल से हम सब इस खबर को सुन /देख रहे हैं और इस पर आए वाट्स अप संदेशों को फॉरवर्ड कर रहे हैं। ऐसा करते समय हमारे आंख की कोर भीगी नहीं, दिल में वह हूक नहीं उठी कि उस पीड़ा में शामिल हैं ऐसा लगे। अनेक संदेश आए और दुःख व्यक्त करते हुए लिखा कि हम और कर भी क्या सकते हैं। अहमदाबाद का विमान हादसा कल इसी वक़्त हुआ जब ये पंक्तियां लिखी जा रही है, और जिस वक़्त आप इसे पढ़ रहे होंगे उस वक़्त तक तो इतने सारे लोगों के मर जाने की खबर आ गई।देश की जमीन पर अब तक का सबसे बड़ा विमान हादसा जिसमें दो सौ अड़सठ (268)लोग मारे गए। सारे यात्री (एक को छोड़ कर)और सारे क्रू मेंबर यानी हवाई जहाज चलाने वाले। सबकी मौत हो गई। विमान उड़ा और सिर्फ़ दो मिनट में ही जमीन पर आ गिरा। आग लग गई। करीब सवा लाख लीटर पेट्रोल भरा था उसमें। सारे लोग जल गए। ऐसे जले कि कोयला हो गए। कोई पहचान नहीं। अब डी एन ए टेस्ट से पहचाने जाएंगे। आग, राख, कोयला बनी लाशें बिखरी पड़ी है। वह विमान पास की बस्ती पर गिरा। मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल और केंटीन पर गिरा। कई डॉक्टर और भावी डॉक्टर जल कर मर गए। वहीं काम कर रहे अनेक लोग भी। यह सब कुछ विस्तार से आ रहा है। आप अपने मोबाइल और टीवी पर सब देख रहे हैं। यह देश का सबसे बड़ा विमान हादसा है। अमेरिका से ख़रीदे गए ये विमान आधुनिक थे। इसी तरह के 47 विमान इंडियन एयर लाइन ने करीब बारह बरस पहले ख़रीदे थे। एक की क़ीमत इक्कीस सौ करोड़ (2100करोड़). दुनिया में ऐसे ढाई हज़ार से ज्यादा हवाई जहाज है जो रोज आसमान पर उड़ते हैं। अहमदाबाद से विमान में बैठे ये लोग लंदन जा रहे थे। सब तरह के लोग थे। किसी की अभी अभी शादी हुई थी तो कोई वहां रह रही बिटिया के साथ कुछ महीने बिताने जा रही थी. कोई वहां नई नौकरी करने तो कोई घूमने फिरने भी. एक पूर्व मुख्य मंत्री भी इस यात्रा में थे। रवाना होने से पहले किसी ने कहां ऐसा सोचा होगा कि अब कभी नहीं लौटेंगे। हममें से कोई भी नहीं सोचता। सोचना भी क्यों भला। सब जीने की उम्मीद लिए ही जीते रहते हैं। हम सब अक्सर यात्रा करते हैं। हवाई जहाज से तो रेल, बस और अपनी निजी गाड़ियों से भी। किसी को नहीं लगता कि जा रहे हैं तो कभी नहीं आएंगे। सब आने पर मिलते हैं या लौट कर फलां काम कर लेते हैं कह कर ही जाते हैं। सबको लौटने की उम्मीद जो होती है।बचपन में माँ कहती थी कि कहीं जाते समय जा रहा हूं नहीं कहते, बल्कि आता हूं कह कर जाना चाहिए। भले ही कितने ही दिनों के लिए जाओ।तब से यही आदत है हम सबकी। आता हूं कह कर जाते हैं। वे सब 229 लोग भी यही कह कर निकले होंगे। नहीं आएंगे अब कभी। 229 ही क्यों बाकी सभी भी तो, वे डॉक्टर, छात्र छात्राएं, अन्य जो सब मारे गए। सभी जल कर कोयला हो गए। जीवन कितना अनिश्चित। शायर हैरत इलाहबादी का शेर है – आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं,. सामान सौ बरस का और पल की खबर नहीं। किसी बड़े हादसे के बाद या किसी की मौत के बाद याद करते हैं लोग। बोलचाल में इसे श्मशान वैराग्य कहते हैं। पर सबसे बड़ा सच तो यही है जिसे हम स्वीकार नहीं करते या करना नहीं चाहते। जिन सलाईयों में बुन कर रिश्तों का स्वेटर बनाते हुए कब हम बड़े हो जाते हैं और कब उसे उधेड़ने लगते हैं पता ही नहीं चलता। आखिर आते तक सब रिश्ते उधड़ ही तो जाते हैं और बिन ऊन की सलाइयाँ थामे उसके बुने होने का भ्रम पाले रहते हैं। विमान हादसे में कोयला हो चुके वे सब भी ज्यादातर ऐसे ही रहे होंगे। हम उन सबको नहीं जानते पर वे सब हैं तो इसी समाज का हिस्सा जहाँ धीरे- धीरे ऐसे ही सारे रिश्ते छीज रहे हैं। देखिए बात कहां पहुंच गई। विमान हादसे से शुरू हुई बात रिश्तों के छीज जाने तक पहुंच गई. हालांकि यह विषयान्तर नहीं है, सब कुछ आपस में जुड़ी हुई बातें हैं। विमान हादसे की खबर आप सब टीवी पर देख ही रहे हैं। बार बार और इतने विस्तार से बताया जा रहा है कि आपको याद हो गया होगा कि यह सबसे बड़ा विमान हादसा है कि इसके पहले दिल्ली के चरखी दादरी में विमान टकरा जाने से 249 लोग मारे गए थे, कि उसके भी बहुत पहले 1966 में मुंबई से लंदन जाने के लिए निकला विमान एक पहाड़ी पर गिर गया था जिसमें 117 लोग मारे गए थे और 1978 में भी मुंबई से रवाना हुआ विमान अरब सागर में गिर गया था जिसमें 213 लोग मारे गए थे। यह सब आप इस हादसे की खबरें पढ़ते, सुनते जान ही गए होंगे। यह तो है ही पर इससे जुड़ी बातें भी है, हाँ वो सुरक्षा आदि की भी है। वो सब भी होगी। जांच होगी। रिपोर्ट आएगी। कोई पढ़ेगा भी नहीं। और फिर सब कुछ वैसे ही चलते रहेगा। हादसे हमें सिखाते हैं पर हम सीखते नहीं। इसी से जुड़ी यह बात भी तो है कि जीवन की इस अनिश्चितता को लेकर हम कितने गंभीर है ? क्या कोई तैयारी होती है हमारी। हम सब अपने बारे में तो सब कुछ जानते हैं पर हमारे अपने ही हमारे बारे में कितना जानते हैं ? हम ऐसा कुछ लिख कर भी नहीं रखते कि हमारे बाद परिजनों को कोई तकलीफ न हो। हर किसी का निजि वित्तीय लेन देन भी होता है। बड़े परिवारों में संपति के बंटवारे नहीं हुए होते और मुखिया ऐसे ही किसी दिन अचानक चले जाता है आता हूं कह कर जाने के बाद भी। इससे ज्यादातर परिवारों में विवाद होते हैं। भाई भाई या भाई बहन कोर्ट कचहरी करते लड़ते रहते हैं। इसलिए कि घर से निकलते समय हम कभी सोचते ही नहीं कि लौट कर नहीं आएंगे। जरुरी है इस हादसे से ही सही सबक लें और अपनी इस तरह की लिखा पड़ी करके रख लें जिसे वसीयत भी कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए लिखना पड़ गया कि ज्यादातर ये सब नहीं करते. मुश्किल से पांच प्रतिशत लोग ही होंगे जो ऐसा करते हों। वे सब जो कल लंदन जाने के लिए रवाना हुए थे उनमें भी अनेक ऐसे होंगे। अनेक के तो बैंक लॉकर भी परिजनों को पता नहीं होंगे। इनके परिजनों को एक एक करोड़ रू का मुआवजा मिलेगा। हो सकता है परिजनों में इसे लेकर भी विवाद हो। भोपाल गैस हादसे के तथा और भी कई मुआवजा मामलों में ये सब बातें आती रही हैं। इस भयावह और बेहद दुःखद हादसे से सबको भीतर तक हिला दिया है। दुखी कर दिया है। उनके दुःख में सब शामिल हैं। अभी जनवरी में शादी हुई थी खुशबू की। पति लंदन में है। कागजात तैयार होने में वक़्त लगा। कल बहुत खुश होकर जा रही थी पिया से मिलने। माँ से बहुत कुछ कही होगी। अब कभी नहीं आएगी। कभी नहीं मिलेगी। केंटीन में बैठे डॉक्टर के मुँह में रोटी का कौर पहुंच पाया भी नहीं या हाथ में ही रह गया। कोई प्लेट में थोड़ी और सब्जी मांग रहा होगा और उसी समय आग बरस गई। सब कुछ जल कर राख। पायलट दीपक ने वहीं से माँ को गुड मॉर्निंग किया और लौट कर आता हूं कहा। हर बार वह ऐसा ही करता। लौट कर रनवे से ही बता देता कि आ गया हूं। माँ हाथ में मोबाइल लिए इंतज़ार कर रही है। वह तो जल कर कोयला हो गया। राख के ढेर में उसके शब्द पुकार रहे होंगे माँ को। जिसे कोई नहीं सुनेगा कभी। ऐसे ही न जाने कितनी सेल्फी, कितनी तस्वीरें, कितने शब्द अहमदाबाद एयरपोर्ट के आसपास तैर रहे होंगे। जिसे कोई न देख सकता है न सुन सकता है। मनुष्य की असीम शक्ति और अनन्य तकनीकी ज्ञान सब कुछ एक सीमा पर जाकर थम जाते हैं। और कितने निरीह हो जाता है वह जब उसके पास इस तरह के हादसों पर कुछ कहने के लिए शब्द भी नहीं होते और चूंकि उस हादसे में हमारा कोई अपना खोया नहीं इसलिए आंखें भीगती भी नहीं। और हम सब इसकी चर्चा करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि टाइप करते हुए उसी समय किसी को जन्मदिन की बधाई टाइप कर रहे होते हैं। ये सब अभ्यस्त उंगलियां करती हैं जिनका दिल से संबंध न जाने कब से ही हमने ख़त्म कर दिया है। आभासी दुनिया में हजारों रिश्ते निभाते हुए कब हम इतने अकेले हो गए पता ही नहीं चला। (अहमदाबाद विमान हादसे में मृत सभी के प्रति श्रद्धांजलि और उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना – न. म. श.) पुनश्च :-इस बात में बहुत कुछ कहना चाह रहा था इसलिए शब्द बार – बार आते और बार – बार बिखरते इसलिए बहुत सी मिली जुली बातें हैं इसे ध्यान में रख कर पढ़िएगा।
▪️. *नथमल शर्मा*.
*शीर्षक हैरत इलाहबादी के शेर से।






